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UGC NET हिंदी इकाई –4: अस्मितामूलक विमर्श: दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श की अवधारणा

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अस्मितामूलक विमर्श: दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श की अवधारणा आधुनिक हिंदी साहित्य और भारतीय समाज में अस्मितामूलक विमर्श एक महत्वपूर्ण वैचारिक आंदोलन है। 'अस्मिता' का अर्थ है 'पहचान'। यह विमर्श समाज के उन वर्गों की पहचान, अधिकार और संघर्ष को केंद्र में रखता है जिन्हें सदियों से हाशिए पर रखा गया है।  दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श इसके प्रमुख स्तंभ हैं। यह विमर्श केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त असमानताओं को चुनौती देता है। आइए, इन चारों विमर्शों को विस्तार से समझते हैं। 1. दलित विमर्श (Dalit Discourse) दलित विमर्श हिंदी साहित्य और समाज का एक सशक्त आंदोलन है, जिसका उद्देश्य दलित समुदाय के जीवन, संघर्ष और अनुभवों को सामने लाना है। यह विमर्श जातिगत भेदभाव, शोषण और अन्याय के खिलाफ एक मुखर आवाज है। मुख्य अवधारणाएँ: अनुभव की प्रामाणिकता: दलित विमर्श में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि दलितों का दर्द और जीवन स्वयं उनके द्वारा ही लिखा जाए। आत्मकथाएँ और कहानियाँ: ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' और मोहनदास नैमिशराय की ...

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